हम अहिंसा के पक्षधर हैं — किन्तु बौद्धों की झूठी अहिंसा ने देश को गर्त में डाल दिया, गांधीजी की झूठी अहिंसा ने भारत को गर्त में डाल दिया। हम क्षात्रबल के पक्षधर हैं।
राजनेताओं ने अपनी रोटी सेंकने के लिए इन शब्दों का प्रयोग किया। शिष्ट व्यक्तियों का कर्तव्य है कि वे इन शब्दों का प्रयोग छोड़ दें।
भगवान स्वयं यहाँ अवतार लेते हैं, धर्म की स्थापना करते हैं। बीज का तो विलोप नहीं हो रहा, न होगा। किन्तु निकट भविष्य में पूरा विश्व वैचारिक क्रांति के आगे नतमस्तक होगा। पूरे विश्व की लाचारी है कि वह मार्ग ढूँढ रहा है, पर उसके पास कोई मार्ग नहीं है। ऐसी स्थिति में आखिर विश्व को हम लोगों के पास आना ही होगा और स्वस्थ मार्गदर्शन लेना ही होगा।
जितनी चिड़िया उड़े आकाश,
चारा है धरती के पास।
पूरे देश का छल-बल डंके की चोट से दिशाहीन कर दिया गया है। गौवंश, सती आदि जितने पृथ्वी के धारक तत्त्व हैं — सबका द्रुत गति से विलोप हो रहा है, सबमें विकृति आ रही है।
जब तक धर्म-नियंत्रित, पक्षपात-विहीन, शोषण-विनिर्मुक्त, सर्वहितप्रद, सनातन शासन-तंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा, तब तक हिन्दुओं का विलोप होता जायेगा।मैं एक संकेत करना चाहता हूँ — भारत को भारत की परंपरा के अनुसार, प्रशस्त परंपरा के अनुसार, आध्यात्मिक मनीषी का मार्गदर्शन सुलभ न हो; भारत अपने अस्तित्व और आदर्श को उद्भासित न कर सके — इस विदेशी कूटनीति पर पानी फेरने की आवश्यकता है।

