ब्राह्मणों कोई भी तीन स्मृतियाँ उठाकर पढ़ लीजिए
चार लोग देखकर कहते थे — ओहो ब्राह्मण हैं, पवित्र हैं, देवता हैं। समाज में ब्राह्मण इतना ऊँचा आदर्श प्रस्तुत करते थे कि सभी धर्म के मार्ग में प्रवृत्त रहते थे।
धर्म का स्वरूपधारण करना ही धर्म है
जो धारण करता है वह धर्म है। धारयति इति धर्मः — धारक-तत्व का नाम धर्म है।
अपने जीवन में धर्म को धारण किया जाता है, अन्यथा कितना ही धर्म-धर्म कहते रहिए — पाखण्डी कहलाएँगे।
इतिहास-पुराण कितना भी पढ़ लीजिए, किंतु व्यवहार में धर्म उतारने के लिए धर्मसूत्र-गृहसूत्रों को मानना ही पड़ेगा। मनुस्मृति से दूरी समस्त हिन्दुओं के पतन का कारण है।
उपनयन संस्कारयज्ञोपवीत के बिना अधिकार नहीं
बिना यज्ञोपवीत धारण किए हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को भी वेदाध्ययन और श्रवण का अधिकार नहीं है। व्रतसम्पन्न ब्राह्मणों को उपनयनरहित ब्राह्मणों का स्पर्श और भोजनपान निषिद्ध है।
शूद्रों को केवल वेद पढ़ना मना है किंतु वेदों को जीवन में उतारना मना नहीं है — जबकि ब्राह्मणों को कला जानना विदित है किंतु उससे जीविकोपार्जन शोभनीय नहीं है। वेदविद्या से वेतन के रूप में कमाया गया धन भी ग्राही नहीं होता है।
मनुस्मृति · १०.८५–८९ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध व्यापार
इदं तु वृत्तिवैकल्यात्त्यजतो धर्मनैपुणम्।
विट्पण्यमुद्धृतोद्धारं विक्रेयं वित्तवर्धनम्॥ १०.८५॥
सर्वान्रसानपोहेत कृतान्नं च तिलैः सह।
अश्मनो लवणं चैव पशवो ये च मानुषाः॥ १०.८६॥
सर्वं च तान्तवं रक्तं शाणक्षौमाविकानि च।
अपि चेत्स्युररक्तानि फलमूले तथौषधीः॥ १०.८७॥
अपः शस्त्रं विषं मांसं सोमं गन्धांश्च सर्वशः।
क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान्॥ १०.८८॥
आरण्यांश्च पशून्सर्वान्दंष्ट्रिणश्च वयांसि च।
मद्यं नीलिं च लाक्षां च सर्वांश्चैकशफांस्तथा॥ १०.८९॥
आज इन पदार्थों के व्यापार में धन है या नहीं? अर्थ का सम्पूर्ण स्रोत शूद्रों के हाथ में दिया गया था। वेदाध्ययन करके कोई धनाढ्य नहीं हो सकता — आज भी वेदपाठी न्यूनधन में तप कर रहे हैं।
प्रायश्चित के विधानब्राह्मण-जीवन की कठोर मर्यादा
ब्राह्मण के अपने जीवन में सर्वाधिक मर्यादा होती थी। जिन-जिन कार्यों पर प्रायश्चित का विधान था:
शुद्धि के नियमगृह, मन और अंतःकरण की पवित्रता
गृह, भोजन, शय्या, वस्तु, वस्त्र, शरीर, मुख, मन और अंतःकरण — इन सभी को शुद्ध रखने के उपक्रम हैं। इतनी शुद्धि होने पर ही वैदिक ज्ञान का सही अर्थ भीतर प्रकाशित होता है।
हर वह विचार, दृश्य, पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति या कर्म जो चित्त को प्रभावित करके निम्नस्तर पर ले जाए, उससे दूरी बनानी चाहिए।
ब्राह्मणों का पतन क्यों?स्वधर्म का परित्याग ही मूल कारण
ब्राह्मण अपनी जाति अनुरूप ब्राह्मणोचित शील और संयम का सम्मान नहीं कर रहे हैं। अपनी सात्विक प्रवृत्ति के विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। पद के उपभोक्ता न होकर कार्यकर्ता बनें।
ब्राह्मण का शरीर परोपकार के लिए होता है — यह शरीर भोग-विलास के लिए नहीं अपितु जप-तप के लिए प्राप्त होता है। ब्राह्मण शरीर प्राप्त होने से पूर्व श्रम, उद्योग, व्यापार, राजभोग की घाटी पार की जाती है — इसलिए पुनः इन प्रवृत्तकर्मों की अभिलाषा करना अपने जीवन के साथ अन्याय है।
सभी वर्णों का कल्याणशूद्र भी भगवत्प्राप्ति कर सकते हैं
शूद्र चाहें तो भगवत्प्राप्ति कर सकते हैं — ब्राह्मणों का अपमान न करके और संतों की सेवा द्वारा। आलसी और अहंकारी व्यक्ति कभी सेवा नहीं कर सकता।
सभी सज्जन ध्यान रखें — जिस जाति में जिसका जन्म होता है, उस योग्य सामर्थ्य भी ईश्वर प्रदान करते हैं। इसलिए अपने स्वधर्म में होने वाले तप में संतुष्टि और सुख की अनुभूति होती है।
"भट्टेखाते में भगवान नहीं मिलते हैं, बहुत त्याग करना पड़ता है। स्वधर्मरूपी भट्टी में स्वयं को तपाना पड़ता है।"
धर्मराज्य भारतवर्ष

