आयुर्वेद · स्वास्थ्य-विज्ञान

आयुर्वेद के अनुसार दीर्घायु और निरोगी जीवन का रहस्य

प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च।

आयुर्वेद का प्रथम प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना है, और रोगी के रोगों को दूर करना उसके बाद आता है।

यह जीवन जीने का एक संपूर्ण विज्ञान है। जो लोग आयुर्वेद से अपरिचित हैं, उनके लिए महर्षि चरक द्वारा 'चरक संहिता' के सूत्रस्थान (विशेषकर 5वें, 6ठें, 28वें और 30वें अध्याय) में वर्णित आहार-विहार के नियम एक संजीवनी के समान हैं।

आज जिन उत्तम नियमों का हम पालन करते हैं — जैसे गर्म (ताज़ा) भोजन करना, पुराना भोजन पच जाने पर ही दोबारा खाना, बहुत जल्दी-जल्दी या बहुत देर लगाकर न खाना, शौचादि से निवृत्त होकर तथा मन शांत होने पर ही भोजन करना — ये सभी नियम हमें आयुर्वेद से ही प्राप्त हुए हैं।

त्रिदोष सिद्धान्तहर व्यक्ति अलग है

इस चिकित्सा पद्धति में आधुनिक चिकित्सा की भांति सिर्फ एक 'पैरासिटामोल' सबको नहीं दी जाती। यहाँ हर व्यक्ति अलग है। उसकी प्रकृति, देश, काल और अवस्था सब भिन्न होती है।

बालकावस्था
कफ प्रधान

स्निग्ध और शीतल पदार्थ हानिकारक — रूक्ष एवं उष्ण पदार्थ हितकर।

युवावस्था
पित्त प्रधान

शीतल पदार्थ अमृत के समान — उष्ण और तीक्ष्ण पदार्थों से बचें।

वृद्धावस्था
वात प्रधान

स्निग्ध, उष्ण और बलवर्धक पदार्थ हितकर — रूक्ष पदार्थ वर्जित।

शरीर में साम्यावस्था (संतुलन) बनाए रखने के लिए विपरीत गुण वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

पारंपरिक ज्ञानखड़े होकर पानी क्यों न पीएँ?

पहले बुज़ुर्ग कहते थे कि खड़े होकर पानी नहीं पीना चाहिए अन्यथा घुटनों में दर्द हो जाएगा। यह इसलिए कहा गया क्योंकि जल का शीत गुण और उसे जल्दी-जल्दी पीना वात दोष को बढ़ाता है। वात का मूल स्थान संधियाँ (Joints) हैं, अतः वह वात वहाँ संचित होकर शूल (दर्द) पैदा करता है।

यदि कोई पारंपरिक बात मानी जा रही है तो उसके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण अवश्य होता है। हमारी बुद्धि अल्प है — इसलिए आयुर्वेद के नियमों में आस्था रखकर ही हम स्वस्थ और दीर्घायु जीवन प्राप्त कर सकते हैं।

जठराग्निशरीर की जीवन-शक्ति

हमारे शरीर में अग्नि हमेशा रहती है — उसका बुझना मतलब मृत्यु होना है। यदि व्यक्ति अपनी जठराग्नि के अनुसार चले, तो वह कभी रोगी नहीं बनेगा। हमारी अग्नि सर्दियों में शरीर से बाहर न आ पाने के कारण भीतर तीव्र होती है, जिससे हम गुरु (भारी) पदार्थ जैसे नया गेहूँ भी पचा लेते हैं। लेकिन ग्रीष्म और वर्षा ऋतु में यही गुरु पदार्थ हानिकारक हो जाते हैं।

॥ ॐ ॥

नित्य सेवनीयरोज खाने योग्य पदार्थ

जो व्यक्ति आयुर्वेद की सभी गूढ़ जानकारियों को नहीं रखते, उनके लिए स्वस्थ रहने हेतु कुछ नित्य सेवनीय पदार्थ बताए गए हैं —

नित्य सेवनीय पदार्थ
षष्टिका (सांठी) चावल मूँग की दाल सेंधा नमक आँवला जौ दूध शुद्ध जल शहद

सावधानियाँआयुर्वेद-विरुद्ध आधुनिक आदतें

⚠ सावधान

सुबह पानी में शहद (मधु) को उबालना — गर्म होने पर शहद विष बन जाता है। उसे बाद में गुनगुने जल में मिलाया जा सकता है, परन्तु सीधे आंच पर गर्म करना उचित नहीं।

⚠ सावधान

दही उष्णवीर्य (गर्म तासीर का) होता है। इसे रात्रि में तथा ग्रीष्म, शरद व वसंत ऋतु में खाना विशेष रूप से वर्जित है। सेवन हमेशा मिश्री, घी या मूँग की दाल मिलाकर ही करें।

थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ न कुछ खाते रहना, बिना भूख के खाना या गलत समय पर खाना — ऐसी गलत आदतें हमारे शरीर में धीरे-धीरे 'आम' (Undigested toxic food) एकत्रित कर देती हैं। यह आम रस स्रोतों में चिपक जाता है और ऑटोइम्यून डिसऑर्डर्स जैसे आमवात (Rheumatoid Arthritis) या मधुमेह (Diabetes) को जन्म देता है।

एकभुक्तं सदा आरोग्यं, द्विभुक्तं बलवर्धनम्।
त्रिभुक्तं सर्वदा रोगं, चतुर्भुक्तं तु मारकम्॥

एक बार भोजन करने वाला सदा आरोग्य रहता है, दो बार भोजन करने से बल बढ़ता है, तीन बार भोजन करने से रोग घेरते हैं और चार बार भोजन करना मृत्यु के समान हानिकारक है।

प्रज्ञापराधजानबूझकर की गई गलती

भले ही आज इतने वर्षों के निरंतर सेवन से अहितकर वस्तुएँ भी आपके शरीर के लिए सात्मय (अभ्यस्त) हो गई हों और तुरंत नुकसान न पहुँचाती हों, लेकिन ऐसा करना 'प्रज्ञापराध' की श्रेणी में आता है —

प्रज्ञापराध से धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) का नाश होता है।
प्रस्तुति

सनातन स्वास्थ्य-विज्ञान

धर्मराज्य भारतवर्ष · आयुर्वेद विशेषांक

Ayush Sharma

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