धर्म का स्वरूप अति सूक्ष्म है, और उसका पालन उतना ही कठोर।
कलिपुरुष गाय और बैल (बछड़े) को मार रहा था। यह देखकर राजा परीक्षित ने दोनों से पूछा कि यह काला पुरुष तुम्हें क्यों मार रहा है। तब दोनों ने कोई उत्तर नहीं दिया। तत्पश्चात बैल ने कहा कि धर्म के कारण हम नहीं बता सकते।
राजा परीक्षित समझ गए कि यह बैल ही मूर्तिमान धर्म है — क्योंकि परनिंदा करना धर्म नहीं है, इसी कारण दोनों मौन हैं।
गुरु द्रोणाचार्य के द्वारा एकलव्य से अंगूठा माँगे जाने पर उसने तत्काल काटकर दे दिया। यह गुरु के प्रति अपार निष्ठा का उदाहरण है।
अश्वत्थामा ने पांडवों के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी। तत्पश्चात एकमात्र गर्भस्थ शिशु (परीक्षित) की भी ब्रह्मास्त्र के द्वारा हत्या का प्रयास किया। तब पाण्डव अश्वत्थामा को बाँधकर लाए और भीम उन्हें मारने के लिए दौड़े।
द्रौपदी जी ने यह देखकर पूछा कि इन्हें क्यों बाँधा है। भीम ने कहा कि इसी ने हमारे पुत्रों की हत्या की है। द्रौपदी जी ने कहा — ये हमारे गुरु द्रोण के पुत्र हैं और ब्राह्मण हैं। गुरु का पुत्र भी गुरु के समान होता है; इनकी हत्या गुरुहत्या के समान होगी। इन्हें तत्काल छोड़ दीजिए।
राणा ने मीरा को विष दिया, परन्तु पातिव्रत्य-धर्म के प्रभाव से वह निष्प्रभाव सिद्ध हुआ। समस्त धर्म एक ओर और अकेला पातिव्रत्य-धर्म दूसरी ओर — पातिव्रत्य-धर्म बलवान है।
हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को अकल्पनीय पीड़ा दी — अग्नि में जलवाया, ऊँचाई से फिंकवाया, समुद्र में डुबवाया, और मारण-प्रयोग तक करवाए। फिर भी प्रह्लाद ने पिता का कोई विरोध नहीं किया और न मन में दुर्भाव आने दिया।
माता सुरुचि ने पुत्र ध्रुव को पिता राजा उत्तानपाद की गोद से उतार दिया और वन जाने को कहा; वे नहीं चाहती थीं कि ध्रुव पिता के उत्तराधिकारी बनें। तब भी ध्रुव ने विद्रोह नहीं किया।
धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है, यह अधिकतर व्यक्ति नहीं जानते। धर्म का प्रथम लक्षण है धृति — धैर्य। जिसमें धैर्य नहीं, वह धर्म से च्युत हो जाता है।
भगवान परशुराम, राजा जनक, नैष्ठिक ब्रह्मचारी भीष्म — ऐसे चार-छः नाम ही हैं जिनके विषय में कहा गया कि उन्हें धर्म का ठीक-ठीक ज्ञान है।
