वर्ण-विवेचन · सनातन जीव विज्ञान

जन्म से ही ब्राह्मण क्यों?

यदि ब्राह्मणधर्म सम्पन्न महानुभाव की सन्तान में तक विपरीत गुण देखने को मिल रहे हैं — तब विचार कीजिए जिनकी उत्पत्ति ब्राह्मण माता-पिता से नहीं है, उनके भीतर से ब्राह्मणत्व कैसे प्रकट होगा?

जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मणत्व को उभारने के लिए अथक प्रयास की आवश्यकता होती है। यद्यपि सामान्यतः ऐसा नहीं होता कि माता-पिता सदाचारी और पुत्र दुराचारी हों। अपने वर्ण के विपरीत या अन्य वर्ण के गुणों का आना वर्ण-संकरता कहलाती है।

वर्ण-संकरताविजाति के अन्न और कर्म का प्रभाव

उदाहरण के लिए — ब्राह्मण का मन किसी अब्राह्मण स्त्री के प्रति आकृष्ट नहीं हो सकता है। यदि ऐसा होता है तब उतने अंशों में उनके भीतर सांकर्य अनुप्रविष्ट है।

📌 संकरता के दो मूल कारक

१. विजाति का अन्न पाने से उस जाति के गुण संलिप्त हो जाते हैं।
२. विजाति का कर्म करने से उन गुणों का ऊपर से आदान हो जाता है।
संभाषण और स्थान का भी प्रभाव पड़ता है।

यदि व्यक्ति स्वजाति अथवा अपने वर्ग के अन्न और कर्म को ग्रहण करे तब उसमें विजाति का गुण आना सम्भव नहीं है।

त्रिगुण सिद्धान्तसृष्टि का मूल स्वभाव

यह सृष्टि त्रिगुणमयी है — यही इसका स्वभाव है। ईश्वर ने इसे ऐसा ही बनाया है, यही माया है। सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण — यह तीन गुण सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान होते हैं।

चारों वर्णों में गुणों का अनुपात
वर्ण
प्रधान गुण
गौण गुण
ब्राह्मण
सतोगुण प्रधान
रजोगुण गौण
क्षत्रिय
रजोगुण प्रधान
सतोगुण गौण
वैश्य
रजोगुण प्रधान
तमोगुण गौण
शूद्र
तमोगुण प्रधान
रजोगुण गौण

सात पीढ़ियों का नियमक्रमिक पतन और पुनरुत्थान

जैसे हिम का जल और जल का वायु में पर्यवसान होता है — न की तत्काल हिम वायु बन जाती है। इसी भाँति किसी भी तत्व का एकाएक निरन्वय नाश नहीं होता है।

⚖ सात पीढ़ियों का सिद्धान्त

ज्यों-ज्यों सतोगुण का लोप होता है त्यों-त्यों ब्राह्मण चिन्ह और लक्षणों का त्याग होने लगता है। सात पीढ़ियों के पश्चात या भीतर ब्राह्मण पद से च्युत हो जाता है। जब तक मूल (base) में सतोगुण बना हुआ है तब तक उसका मंथन करके उसे उभारा जा सकता है।

रोटी की मर्यादा टूटना इन सभी विसंगतियों का मौलिक कारण है। इसलिए भ्रष्ट भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
॥ ॐ ॥

बीज का सिद्धान्तआधुनिक विज्ञान और सनातन जीव विज्ञान

धरती में टमाटर का बीज बोने पर टमाटर का पौधा ही उत्पन्न होता है — बैंगन होना असम्भव है।

आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि माता-पिता के गुण बालक में अवश्य आते हैं। सनातन जीव विज्ञान के अनुसार माता-पिता अपनी क्षमता के अनुसार ही जीव को बालक-बालिका के रूप में उत्पन्न करते हैं।

भारत में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं — विशेषकर समुद्रतट निकटीय और पहाड़ी क्षेत्र — जहाँ सभी वर्णों के लोग मांस भक्षण करते हैं। निसंदेह मांस से तमोगुण की प्राप्ति होती है किंतु जहाँ शाकाहार सहज-सुलभ है, वहाँ मांस भक्षण करने वाले ब्राह्मण विद्वानों की श्रेणी में सम्मान नहीं पाते हैं।

वस्त्र का दृष्टान्तउत्पत्ति का प्रयोजन और संस्कार की अनिवार्यता

कई प्रकार के पोछे होते हैं — सभी बाज़ार से स्वच्छ प्राप्त होते हैं, किंतु उनका उपयोग भिन्न-भिन्न कार्यों में होता है:

🫙
बर्तन पोछने का

रसोई के पात्रों की सफाई हेतु

🧹
भूमि पोछने का

धरातल की शुद्धि हेतु

🛁
शरीर पोछने का

स्नानोपरांत देह शुद्धि हेतु

🪔
देवविग्रह का

मूर्ति प्रक्षालन हेतु — सर्वोत्तम

📌 मूल सिद्धान्त

देवविग्रह वाला कपड़ा मैला होने पर भी धुले हुए भूमि-पोछने के कपड़े के स्थान पर मूर्तियाँ पोछने में उपयोग किया जाएगा। यदि कुछ समय तक देवविग्रह का कपड़ा बर्तन या भूमि पोछने के कार्य में उपयोग किया जाए तब उसे पुनः पूजा के कार्य में उपयोग नहीं कर सकते।

अतिशय हर्ष, प्रेम, आनन्द, समता और स्वस्थचित्तता —
यह सद्गुण अकस्मात् या किसी कारणवश विकसित हों,
तब समझना चाहिए कि यह सात्विक गुण हैं।

— शांतिपर्व, महाभारत
॥ ॐ ॥

संस्कार का अर्थचावल का दृष्टान्त

कई प्रकार के चावल होते हैं — जिसे ज्ञान नहीं है वह उनके मध्य अन्तर नहीं बता सकता:

बासमती मोगरा गोविंदभोग इंद्रायणी पलक्कड़न मट्टा काला चावल

कोई चावल शीघ्र पकता है और कोई विलम्ब से। तत्पश्चात उसे ग्राही बनाने के लिए नमक, मटर, घृत आदि डाला जाता है। इसी प्रक्रिया को संस्कार करना कहते हैं। कंकड़ को कितना भी धोने या पकाने से वह भोज्य नहीं हो जाएगा।

यदि बासमती चावल को मैले जल से धोया और नाली के जल से पकाया जाए तब स्वाद में विकृति आने पर क्या चावल का दोष है? सर्वोत्तम चावल भी सही संस्कार के बिना व्यर्थ हो जाता है।
निष्कर्ष

संस्कार माने व्रतबन्ध किया जाना, संस्कार माने विकृत वातावरण से दूर रहने का ज्ञान देना, संस्कार माने उसके गुणों के अनुसार शिक्षा प्रदान करना। यदि ब्राह्मण जन्म से सतोगुणी है तब संस्कार का प्रयोजन है — सतोगुण को उभारना और रजोगुण-तमोगुण को दबाना। सभी प्रकार के चावलों की अपनी महत्वता है — और सभी को उचित संस्कार की आवश्यकता पड़ती है।

प्रस्तुति

धर्मराज्य भारतवर्ष

वर्ण-विवेचन · Ayush Sharma

Ayush Sharma

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