मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और महर्षि वशिष्ठ
भारतीय वास्तुकला, संस्कृति और अध्यात्म में भगवान श्रीराम और उनके कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ का संबंध गुरु-शिष्य परंपरा का सबसे स्वर्णिम अध्याय है। महर्षि वशिष्ठ सूर्यवंश के पुरोहित थे, जिन्होंने राजा दिलीप, रघु और दशरथ के बाद श्रीराम का मार्गदर्शन किया।
जस वसिष्ठ कहि राखेउ बिचारी।
— रघुकुल में गुरु वशिष्ठ की आज्ञा और विचार ही सर्वोपरि थे।
रामचरितमानस — गोस्वामी तुलसीदास
१ · बाल्यकालजीवन निर्माण का स्वर्णिम काल
भगवान विष्णु के अवतार होने के बाद भी, श्रीराम ने मानवीय लीला को सार्थक करने के लिए महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त की।
वशिष्ठ जी ने श्रीराम और उनके भाइयों को वेदों, उपनिषदों, नीतिशास्त्र और युद्धकला में निपुण बनाया।
किशोर अवस्था में जब श्रीराम के मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ, तब वशिष्ठ जी ने जो दिव्य उपदेश दिया, वह आज 'योग वाशिष्ठ' के नाम से प्रसिद्ध है — अद्वैत वेदांत का अनमोल रत्न।
२ · संकट के क्षणरघुकुल के अटल रक्षक
जब-जब रघुकुल पर विपत्ति आई, महर्षि वशिष्ठ अपनी दूरदर्शिता और तपोबल के साथ अडिग खड़े रहे:
राजा दशरथ को संतान प्राप्ति के लिए ऋष्यशृंग मुनि को बुलाने का परामर्श और यज्ञ का सफल संचालन वशिष्ठ जी की देखरेख में ही हुआ।
राजा दशरथ की मृत्यु और श्रीराम के वनवास जाने के बाद जब अयोध्या नेतृत्वविहीन हो गई थी, तब वशिष्ठ जी ने ही भरत को वापस बुलाकर राज्य में शांति व्यवस्था स्थापित की और राजधर्म की रक्षा की।
श्रीराम के वनवास से लौटने के बाद, महर्षि वशिष्ठ ने ही उनका राज्याभिषेक किया और रामराज्य की नींव रखी।
३ · रामराज्यसुशासन का सर्वोच्च पैमाना
'रामराज्य' जिसे आज भी सुशासन का सर्वोच्च पैमाना माना जाता है, उसकी नीतियों के पीछे महर्षि वशिष्ठ का ही मार्गदर्शन था।
श्रीराम और महर्षि वशिष्ठ का संबंध यह संदेश देता है कि शक्ति और शांति, शासन और तपस्या का समन्वय ही सच्चे आदर्श राज्य की आधारशिला है। इन दोनों का मिलन — ब्रह्मशक्ति और क्षात्रशक्ति का साक्षात संगम — भारतीय परंपरा का वह स्वर्णिम आदर्श है जो युग-युगान्तर तक प्रासंगिक रहेगा।
धर्मराज्य भारतवर्ष

