About Us
हमारे विषय में
धर्मराज्य भारतवर्ष
सुप्त सनातन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व
धर्मराज्य भारतवर्ष शासन और समाज की सुप्त सनातन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
धर्मराज्य की आवश्यकता क्यों?
हर क्षेत्र — पतन नहीं, उत्थान की ओर
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के प्रकल्प पतन नहीं, बल्कि उत्थान करने वाले हों —
शिक्षारक्षाशासन
व्यापारकृषिउद्योग
शौचस्नानभोजन
वस्त्रआवासविवाह
पर्वन्याययातायात
चिकित्साशयनभोग
वार्तालापक्रीड़ामनोरंजन
जीविका
— लोक और परलोक का कल्याण।
हमारी चिंता
मूल पर कुठाराघात
शिक्षा और न्याय
धर्म के अभाव में बढ़ती नास्तिकता और अपराध।
पारिवारिक ढाँचा
संस्कारों के बिना विवाह आदि संस्थाओं में विकृति।
राष्ट्र विखंडन
१८०२ से अब तक पाँच बार हुआ देश का विभाजन।
वाणिज्य
गोहत्या, बूचड़खाने और मिलावटखोरी का सामान्य होना।
अर्थव्यवस्था
अति धनसंचय और बढ़ती दरिद्रता का असंतुलन।
धर्मराज्य की स्थापना से क्या होगा?
एक सुव्यवस्थित, धर्मनिष्ठ समाज
✓ वेदलक्षणा गोवंश की रक्षा
✓ मन्दिर स्वतन्त्र
✓ गुरुकुलों को दान
✓ सभी की जीविका जन्म से सुरक्षित
✓ मदिरालय व वेश्यालय का उन्मूलन
✓ वातावरण शुद्ध
✓ खाद्य पदार्थों के बीज विकृत नहीं
आज की अशुद्धि
पंच-विषयों की शुद्धता का ह्रास
शब्द
शुद्ध शब्द नहीं
चपलवाणी व अपशब्द।
स्पर्श
शुद्ध स्पर्श नहीं
शौचाचारहीनता — स्नान तक न करना।
रूप
शुद्ध रूप नहीं
अश्लील दृश्य।
रस
शुद्ध रस नहीं
मैला व रसायनयुक्त पेयजल।
गंध
शुद्ध गंध नहीं
प्रदूषित वायु व अभक्ष्य जीवों के पकने की दुर्गंध।
